
Vamana Ji Ki Katha
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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु ने अपने पाँचवें अवतार वामन अवतार के रूप में जन्म लिया था। इस दिन को वामन द्वादशी या वामन जयंती के नाम से मनाया जाता है। भगवान वामन की कथा धर्म, विनम्रता, दान और अहंकार के त्याग का संदेश देती है।
प्राचीन काल में दैत्यराज बलि अत्यंत पराक्रमी, दानी और धर्मप्रिय राजा थे। उन्होंने अपने पराक्रम और तपस्या के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं का स्वर्ग भी उनके अधीन हो गया था। यद्यपि राजा बलि न्यायप्रिय थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अपनी शक्ति और साम्राज्य का अभिमान होने लगा।
देवताओं ने अपनी स्थिति देखकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। देवमाता अदिति ने भी अपने पुत्रों की रक्षा के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वचन दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेकर देवताओं की सहायता करेंगे।
कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अदिति और महर्षि कश्यप के घर एक दिव्य बालक के रूप में जन्म लिया। यह बालक आकार में छोटा था, इसलिए उसका नाम वामन रखा गया। वामन रूप में भी भगवान का तेज और दिव्यता अद्भुत थी।
जब भगवान वामन बड़े हुए, तब उन्होंने सुना कि राजा बलि एक विशाल यज्ञ कर रहे हैं, जिसमें वे आने वाले प्रत्येक याचक को मनचाहा दान दे रहे हैं। भगवान वामन ब्राह्मण बालक का रूप धारण करके उस यज्ञशाला में पहुँचे।
राजा बलि ने उस तेजस्वी बालक का आदरपूर्वक स्वागत किया और कहा, "हे ब्राह्मण कुमार! आप जो चाहें मांग लें। मैं आपको अवश्य दान दूँगा।"
भगवान वामन ने विनम्र स्वर में कहा, "महाराज, मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए, जहाँ मैं अपना आश्रम बना सकूँ।"
राजा बलि हँस पड़े और बोले, "आप इतने छोटे हैं और केवल तीन पग भूमि मांग रहे हैं? मैं आपको पूरा राज्य भी दे सकता हूँ।"
लेकिन वामन ने कहा, "जिसे जितनी आवश्यकता हो, उतना ही मांगना चाहिए। मुझे केवल तीन पग भूमि ही चाहिए।"
राजा बलि ने दान देने का संकल्प ले लिया। तभी उनके गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें चेतावनी दी कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। वे तुम्हारी परीक्षा लेने आए हैं। लेकिन राजा बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने कहा, "यदि स्वयं भगवान भी याचक बनकर आए हैं, तो उन्हें दान देना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।"
जैसे ही राजा बलि ने दान का संकल्प पूरा किया, भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। उनका स्वरूप इतना विशाल हो गया कि पूरा ब्रह्मांड उसमें समा गया।
भगवान ने पहले पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया। दूसरे पग में स्वर्ग और समस्त आकाश को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा।
तब भगवान वामन ने राजा बलि से पूछा, "महाराज, अब बताइए तीसरा पग कहाँ रखूँ?"
राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर झुका दिया और कहा, "प्रभु, मेरे पास अब कुछ भी नहीं बचा। आप अपना तीसरा चरण मेरे सिर पर रख दीजिए।"
भगवान वामन ने राजा बलि के सिर पर अपना तीसरा चरण रखा। इससे बलि का अहंकार समाप्त हो गया और वे पूर्णतः भगवान के चरणों में समर्पित हो गए।
राजा बलि की सत्यनिष्ठा, दानशीलता और भगवान के प्रति समर्पण देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को पाताल लोक का राजा बनाया और वरदान दिया कि वे सदैव उनकी रक्षा करेंगे। साथ ही यह भी आशीर्वाद दिया कि उनका नाम युगों-युगों तक दानवीर राजा के रूप में स्मरण किया जाएगा।
तभी से भगवान वामन की पूजा की जाती है और राजा बलि की दानशीलता का उदाहरण दिया जाता है। यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति और संपत्ति का अभिमान नहीं करना चाहिए तथा सत्य, दान और विनम्रता का पालन करना चाहिए।
About Shri Vamana Dev Ji
Name:
Alternate Names:
Trivikrama
Category:
Devta
Gender:
Male
Day:
Thursday
Tithi:
Ekadashi
Vahan:
Garuda
Favorite food:
Kheer
Favorite color:
Yellow
Suggested Seva:
Feed the Needy
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